शनिवार, 27 नवंबर 2010

" खो गया है कुछ "


वो बनते बिगड़ते रिश्तो का
मौसम कहा गया
वो रुठते - मानते जज्बों का
आलम कहा गया ||1

बेखुदी में बनाई थी
जों तस्वीर आग की
दामन जला था जिससे
वो चिलमन कहा गया ||2

सरफ़रोश थे हम
जब थे ज़वा- ज़वा
बचपने की हरकतों में
जवानी का जोबन कहा गया || 3

बनाई थी बारिश में
जों कश्ती साथ की
वो कश्ती कहा गयी
वो सावन कहा गया ||

मेरी कलम से ......लक्की

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

एक चिठ्ठी अल्लाह के नाम


आँसुओ से हम अपनी इबादत लिख रहे है,
ऐ खुदा तुझ तक पहुचे तो ये चाहत लिख रहे है|
वो कितनी आसानी से नाकाबिल कह गए हमें
हम जों काबिलियत के वास्ते ये आयत लिख रहे है|| 1

यूँ मुहाजिर बन गए हम अपने ही महकमे में
दोस्तों को क्या कहे उन्हें शातिर लिख रहे है|
या मेरे मोला मिला दे अब उससे,
जिसको हम अपनी हिज्र के खतिर लिख रहे है || 2

ना मुरादी अब हमसे सही नहीं जाती
हम अपनी बर्दास्तागी की खातिर लिख रहे है|
नाकाफी है इस दुनिया में जानते है हम
बस दुनिया ये न जाने, की ये बाते लिख रहे है|| 3

तुम ने जैसा बनाया बन गए हम
इसलिए किस्मत को आजमाइश लिख रहे है|
थोड़ी समझदारी अब हमे भी अता कर
जों अपनी मासूमियत को रहनुमाइश लिख रहे है|| ४

....................लक्की
* इबादत = प्राथना,पूजा *एहले =खुद , स्वयं , * मुहाजिर = शरणार्थी
*महकमा =समूह,* हिज्र = जिद , *नामुरादी =असंतोष,किसी चीज़ का न होना ,
* आजमाइश =परखना ,* रहनुमाइश =आगे बदने वाली चीज़ ,लीडर ,|

शुक्रवार, 11 जून 2010

एक बार फिर


ठगा हुआ महसूस होता है, एक बार फिर
कर रहा है कोई मेरा ,इन्तजार
फिर
पता नहीं हमे यहाँ पर, किसकी तलाश
है
या फिर हमे तालाशरहा कोई , गुनाहगार फिर 1

हमने बड़ी ख़ुशी से उसे, फ़रिश्ता बना दिया
क्या पता छिपा लिबास में ,शैतान
फिर
मोका मिला था खुद को फिर ,जीने को जिन्दगी
लगता जीने में बाकी अभी है ,देर-दार फिर 2

अपनी हसरतो को हमने ,हँसकर मिटा दिया
उम्मीदों से बंधी है क्यू? ये पतवार फिर
कोशिश करो के निकले, सब गुबार दिल से
खुद को रखेगे तन्हाई में, एक बार फिर 3

कैफ, निदा और बद्र साहब के, नाम लिया करते है
उनसे बड़ा दीखता नहीं कोई, वफादार फिर
गजलो में अपनी छुपाते है , मासूमियत को
क्या पता सुनने वाला हो समझदार फिर4

शनिवार, 5 जून 2010

उम्मीद


धुंधले से सायो में तस्वीर नजर आती है ,
कंही दूर खढी तकदीर नजर आती है |
मालूम नहीं है , कहा है मंजिल
मिलेगी एक दिन ,तामिल नजर आती है ||

उजढ़े हुए नवाबो की थी शख्सियत
अब कही मिली जागीर नजर आती है |
उसके एहसास की जुस्तजू है दिल में
दूर खढी वो जानशी नजर आती है ||

लक्की
................

शनिवार, 15 मई 2010

सीख पतंग की


उडी पतंग आसमान में
उमंगो की डोर लिये|
लडती हवा से बलखाती हुई
हाथो का जोर लिये ||

कहना था उसे बहुत कुछ
शब्दों का जोर था |
मन में कुछ विचार थे
हवा का भी शोर था ||

कभी दाये तो कभी बाये
हरतरफ उलझन थी जिसको |
कभी आगे तो कभी पीछे
बदने की होड़ थी उसको ||

लडती कभी हवा से कभी
कभी पेच लड़ाती थी |
पर जब भी देखो हरदम
आगे ही बढती जाती थी ||

निराला अंदाज था उसका
अटल विश्वास था उसका |
बिन कुछ बोले वो पतंग
सब कुछ ही कह गई ||

आगे ही बड़ने की राह
हम को वो दे गई |
कह गई पथ में हरदम
आगे ही बड़ते जाना है ||

मुश्किलों को झेल लेना
कभी न घबराना है |
यही जिन्दगी का अटल सत्य है
रुक जाना म्रत्यु का पथ है ||

ये कह कर पतंग ने
जीना हमको सिखा दिया |
जों इन्सान खुद ना कह सका
पतंग ने कर के दिखा दिया ||

इतना कह कर कट गई पतंग
आसमान के फलक से सट गई पतंग
आसमान के फलक से सट गई पतंग
आसमान के फलक से सट गई पतंग......... ||
.................... लक्की

बुधवार, 5 मई 2010

मौजुदगी


गुजरे वक़्त की कशिश अब भी कही मौजूद है,
तनहा
जीने की वजह अब भी कही मौजूद है |

अकेलेपन की बेड़िया तोड़ने में रहे हम,
उन
बेडियो की दमक अब भी कही मौजूद है |

अपने मुकद्दर से करने चले थे बगावत,
उस
बगावत की ललक अब भी कही मौजूद है|

एक ही रास्ते पे खाई है ठोकरे बार बार,
उन
ठोकरों की जरुरत अब भी कही मौजूद है |

............................. लक्की

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

बेबसी


दर तक आकर तेरे,
दीदार को तरस जाते है|

किस्मत को कोसते है कभी,
कभी अपनों पर बरस जाते है||

हालात का है दोष या ,
नसीब का फरमान है |||

मंजिल तक आते आते
राहों से भटक जाते है ||||

दर तक कर तेरे ,
तेरे दीदार को तरस जाते है |
...............................लक्की

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

बदलाव जरुरी है


सूखे फूलो की महक अब बड़ गई है ,
तेरी तस्वीर से मोहब्बत बड़ गई है |

ताकीर हिमाकत की रुपहले परदे में
आई थी जों उल्फत वो बड़ गई है |

जमीनों जद्द रहे हम जहाँ गुलशनो के मौसम में
उन राहो की शख्सियत बड़ गई है |

जिस्म- जहान के फेर में, मै उलझा ही नहीं था
तेरे जाने से पर ये तबियत बदल गई है |

हर चेहरे की संजीदगी अब मजाक लगती है मुझे
मासूमियत की भी तो सूरत ही मर गई है |
...............................लक्की

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

एक कदम दुनियादारी की और

खुद की नजरो का ये धोका अब हमें मंजूर है |
अपने हालाथो का सौदा अब हमें मंजूर है ||

बेअदब और बेहयाई अब तलक हराम थी |
उनकी फितरतो का यूँ कसना अब हमें मंजूर है||

गर मंजिले मिलती है जो कही खैरात मै|
तो फिर खैरातो की रहमत अब हमें मंजूर है ||

उठ कर गिरना गिर कर उठना आदतों में था मगर|
बैसाखियों से हुई मोहब्बत अब हमें मंजूर है ||

मै क्यों मुख्तल ज़माने को बदलने की जिद करू |
ये बेइज्जती ये बेगुमानी अब हमें मंजूर है ||
...............................लक्की (भाई जान की मदद से)



*बेअदब = आशिष्ट ,असभ्य ,*बेहयाई =बेशर्म ,* फितरतो =स्वाभाव ,खैरात =भीख ,