सोमवार, 19 अप्रैल 2010

बेबसी


दर तक आकर तेरे,
दीदार को तरस जाते है|

किस्मत को कोसते है कभी,
कभी अपनों पर बरस जाते है||

हालात का है दोष या ,
नसीब का फरमान है |||

मंजिल तक आते आते
राहों से भटक जाते है ||||

दर तक कर तेरे ,
तेरे दीदार को तरस जाते है |
...............................लक्की

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

बदलाव जरुरी है


सूखे फूलो की महक अब बड़ गई है ,
तेरी तस्वीर से मोहब्बत बड़ गई है |

ताकीर हिमाकत की रुपहले परदे में
आई थी जों उल्फत वो बड़ गई है |

जमीनों जद्द रहे हम जहाँ गुलशनो के मौसम में
उन राहो की शख्सियत बड़ गई है |

जिस्म- जहान के फेर में, मै उलझा ही नहीं था
तेरे जाने से पर ये तबियत बदल गई है |

हर चेहरे की संजीदगी अब मजाक लगती है मुझे
मासूमियत की भी तो सूरत ही मर गई है |
...............................लक्की

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

एक कदम दुनियादारी की और

खुद की नजरो का ये धोका अब हमें मंजूर है |
अपने हालाथो का सौदा अब हमें मंजूर है ||

बेअदब और बेहयाई अब तलक हराम थी |
उनकी फितरतो का यूँ कसना अब हमें मंजूर है||

गर मंजिले मिलती है जो कही खैरात मै|
तो फिर खैरातो की रहमत अब हमें मंजूर है ||

उठ कर गिरना गिर कर उठना आदतों में था मगर|
बैसाखियों से हुई मोहब्बत अब हमें मंजूर है ||

मै क्यों मुख्तल ज़माने को बदलने की जिद करू |
ये बेइज्जती ये बेगुमानी अब हमें मंजूर है ||
...............................लक्की (भाई जान की मदद से)



*बेअदब = आशिष्ट ,असभ्य ,*बेहयाई =बेशर्म ,* फितरतो =स्वाभाव ,खैरात =भीख ,