मेरे सामने स्याह समन्दर है,
कुछ शोर मचाता ,कुछ गुनगुनाता सा |
रात हो चली है और सब कुछ शांत है
सिवाए उस समंदर के जों कुछ कहना चाह रहा है शायद
उसकी लहरे टकराती है मेरे पांवों से और कुछ देर रुक जाती है
फिर आगे जा कर रेत में कही ज़ज्ब हो जाती है
फिर एक और लहर आती है, फिर एक और
इस तरह समन्दर बार बार अपना संदेशा भेजता है मुझ तक और में ;जों समझ नहीं पा रहा उसकी बाते|
हां पर इतना जरुर समझ गया हु की वो समंदर जों शांत था थोड़ी देर पहले तक
क्यों हो चला है अचानक इतना व्यग्र , चंचल और उद्वेलित
क्योकि अब वो अकेला है और उससे बात करने वाला कोई नही
कुछ देर पहले तक बहुत से बच्चे थे उसकी रेत पर घरोंदे बनाते हुए ,
बहुत से प्रेमी युगल थे भविष्य के सपने सजाते हुए,
बहुत से जवान थे अपनी ख्वाइशो का जखीरा लिए और कुछ बुजुर्ग भी थे अपनी यादो की जंजीरे लिए
पर अब कोई नहीं है उसके पास
अब वो अकेला है तन्हा है इसलिए मचल रहा है
किसी के साथ वक़्त गुजiरने के लिए
किसी को अपनी बाते सुनने के लिए
दोस्ती और हमदर्दी ये शब्द उसके लिए भी मायने रखते है |
कितनी अजीब बात है की समंदर और दिल दोनों गहरे है
जों ज़ज्ब करके रखते है न जाने कितने राज
सहते है न जाने कितनी मुश्किलें
पर तन्हाई दोनों को कचोटती है
अबकी जों लहर मेरे पांव से टकराई में समझ गया की समंदर क्या कह रहा है
उन लहरों को सहलाते हुए मेने भी कह दिया अभी कुछ देर हु में तुझसे बात करने को
............मुंबई के नाम जों भीड़ में भी तन्हा है.............. लकुलीश शर्मा