सोमवार, 29 जनवरी 2018


 तन्नु और मन्नू की शादी हो गयी , फिर क्या हुआ ...शादी की बाद की कहानी कोई नही बताता .... यह जुमला अब पुराना हो जाएगा ..क्योकि शादीi के बाद भी कहानी बनती तो है ... वह कहानी जो जानी पहचानी है ..जो प्यार की दुश्मन है ..जो बोरिंग जिंदगी से शुरु होती है ...और प्यार के खात्मे पर ख़तम होती है , यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है ..जो प्यार के ख़त्म होने और फिर से प्यार होने के फलसफे को बयाँ करती है |

 निर्देशक आनंद एल रॉय और लेखन हिमांशु शर्मा की जोड़ी फिर एक ऐसी फिल्म का मंचन करती है की आप पहली फ्रेम से आखरी फ्रेम तक परदे से कुछ चिपके चिपके नज़र आते हैं | फिल्म तनु वेड्स मनु returns की कहानी में कहने के लिए कुछ नही है ...कहानी वही है जो नाम से ही पता चल जाती है ...अब अगर नाम तनु वेड्स मनु है तो कहानी में तनु की शादी तो राजा से होने से रही | वही होना है जो फिल्म का टाइटल कहता है , पर कैसे होना है यह दिखाना अपने आप में कला है और इसी बात के कलाकार है आनद एल राय |

फिल्म की कहानी शुरू होती है शादी के ४ साल बाद से जब शादी में सिर्फ झंझट और लड़ाई झगडा ही बचता है | तनु उर्फ़ तनूजा त्रिवेदी ( कंगना रानाउत) मनु उर्फ़ मनोज शर्मा से नाराज़ हो वापस कानपुर आ जाती है | इस नाराजगी की लड़ाई में पप्पी ( दीपक डोबरियाल ) जहाँ मन्नू भिया का साथ देते है तो वहीँ कंधे के रूप में तन्नु को मिलता है चिंटू ( मोहम्मद जीशान अयूब ) का साथ ..फिर कहानी में आता है ट्विस्ट और एक और राजा अवस्थी ( जिम्मी शेरगिल ) आ जाते हैं वहीँ कुसूम के रूप में कंगना रानाउत की फिर से entry होती है | अब ये कहानी कुछ रोचक मोड़ लेती हुई अपने नाम को पूरा करने निकल पड़ती है |

 फिल्म की कहानी  पर ज्यादा कुछ कहने के लिए कुछ नहीं है ,पर पटकथा   फिर भी अच्छी कही जा सकती है , संवाद (dialogue) उससे भी ज्यादा अच्छे और दमदार हैं  और अभिनय (एक्टिंग) तो अपने चरम पर है | कंगना रानाउत ने अपनी अदाकारी से सबको पानी पिलाया है , यह कहना सही नहीं होगा की बाकि सब की एक्टिंग कमजोर है , पर कंगना ने जो अभिनय दिखाया है ख़ास तौर पर कुसुम के किरदार में उसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम लगती है | फिल्म के क्राफ्ट के नज़रिए से यह पार्ट १ से थोड़ी कमजोर है पर मनोरंजन के तराजू पर इसका पलड़ा कही भी नीचे नहीं झुकता है |

गीत -संगीत की बात की जाए तो ठीक ही कहा जाएगा .. ना बहुत अच्छा ना बहुत बुरा ...पर इसमें आपको कही वडाली बंधुओ की कमी लग सकती है | यहाँ पर तुलना अगर पार्ट १ से ना की जाए तो फिर इस शिकायत का कोई मतलब नही | एडिटिंग मख्खन की तरह लगती है ...वैसे सच्चाई तो यह की फिल्म में इस और ध्यान ही नहीं जाता |

कुल मिला कर कहा जाए तो आनद एल राय और हिमांशु शर्मा ने इस फिल्म के जरिये अब खुद को एक अलग मुकाम दे दिया है | वैसे इससे पहले भी इन्हें किसी पिछड़े क्रम में नही रखा जा सकता था ,पर यह फिल्म यह साबित करती है की .. सफलता नसीब का खेल हो सकती है ..पर अच्छे काम चमत्कार से पैदा नहीं होते ... उनके लिए मेहनत लगती है जो इस फिल्म में दिखाई देती है ... खास तौर पर फिल्म के scene की detailing जबरदस्त है | जब लगि आवौं सीतहि देखि , होइही काजू मोहि हर्ष बिसेषी|| सुंदर काण्ड के इस चौपाई की खूबसूरती अपने आप में बढ़ जाती है जब आप सामने से तनु को आते हुए देखते हैं , रावन कहे जाने वाले राजा अवस्थी से सामने लेखक ने सीता के किरदार को सुन्दरकाण्ड की एक चौपाई से गढ़ दिया | एक ऐसी सीता जिसमे रामायण की सीता को कोई क्वालिटी ही नहीं है ..पर यह फिल्म की खूबसूरती और कलमकार की क्रिएटिविटी की कहानी है |

यह फिल्म एक फुल फ़्लैश entertainment की सौगात है , जो दर्शको को सिनेमा हाल तक खीचने में कामयाब रखेगी | फिल्म को सिर्फ इसलिए देखना की की जो पता है वो कैसे होगा और यह suspense बना रहना ही इस फिल्म की खासियत है , मुझे यहाँ पर हिंदी की एक लाइन याद आती है " रसात्मक वाक्यं काव्यं " ...यानि रस से भरा वाक्य ही काव्य या कविता है ..इसे अगर थोडा बदल दिया जाए तो कहा जा सकता है " रसात्मक फिल्मम तनु वेड्स मनु रिटर्न्स " #tanuwedsmanu #tanuwedsmanureturn #kangna

रविवार, 1 दिसंबर 2013

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

समंदर से एक मुलाकात



मेरे सामने स्याह समन्दर है,

कुछ शोर मचाता ,कुछ गुनगुनाता सा |

रात हो चली है और सब कुछ शांत है

सिवाए उस समंदर के जों कुछ कहना चाह रहा है शायद

उसकी लहरे टकराती है मेरे पांवों से और कुछ देर रुक जाती है

फिर आगे जा कर रेत में कही ज़ज्ब हो जाती है

फिर एक और लहर आती है, फिर एक और

इस तरह समन्दर बार बार अपना संदेशा भेजता है मुझ तक और में ;जों समझ नहीं पा रहा उसकी बाते|

हां पर इतना जरुर समझ गया हु की वो समंदर जों शांत था थोड़ी देर पहले तक

क्यों हो चला है अचानक इतना व्यग्र , चंचल और उद्वेलित

क्योकि अब वो अकेला है और उससे बात करने वाला कोई नही

कुछ देर पहले तक बहुत से बच्चे थे उसकी रेत पर घरोंदे बनाते हुए ,

बहुत से प्रेमी युगल थे भविष्य के सपने सजाते हुए,

बहुत से जवान थे अपनी ख्वाइशो का जखीरा लिए और कुछ बुजुर्ग भी थे अपनी यादो की जंजीरे लिए

पर अब कोई नहीं है उसके पास

अब वो अकेला है तन्हा है इसलिए मचल रहा है

किसी के साथ वक़्त गुजiरने के लिए

किसी को अपनी बाते सुनने के लिए

दोस्ती और हमदर्दी ये शब्द उसके लिए भी मायने रखते है |

कितनी अजीब बात है की समंदर और दिल दोनों गहरे है

जों ज़ज्ब करके रखते है न जाने कितने राज

सहते है न जाने कितनी मुश्किलें

पर तन्हाई दोनों को कचोटती है

अबकी जों लहर मेरे पांव से टकराई में समझ गया की समंदर क्या कह रहा है

उन लहरों को सहलाते हुए मेने भी कह दिया अभी कुछ देर हु में तुझसे बात करने को



............मुंबई के नाम जों भीड़ में भी तन्हा है.............. लकुलीश शर्मा



गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

"बेहतर है "

आँसुओ की कशिश मुस्कान से बेहतर है ;
सच्चाई की नमी झूट के एहसान से बेहतर है ||1

एक दिल है इन्सां का हँसता भी है रौता भी
इस हँसने रोने की माटी सोने की दुकान से बेहतर है ।२

वो आते है पास में नकाबे- खुशी ओड़कर
कोई उनसे जा कह दे गालो पर आँसुओ का निशां बेहतर है ||3

हम डरते है की वो बिछड़ गए तो हाले- दिल क्या होगा
इसलिए लक्की अब समझ की रिश्तो से बस जान -पहचान बेहतर है ।४ मेरी कलम
से लक्की ........................

शनिवार, 27 नवंबर 2010

" खो गया है कुछ "


वो बनते बिगड़ते रिश्तो का
मौसम कहा गया
वो रुठते - मानते जज्बों का
आलम कहा गया ||1

बेखुदी में बनाई थी
जों तस्वीर आग की
दामन जला था जिससे
वो चिलमन कहा गया ||2

सरफ़रोश थे हम
जब थे ज़वा- ज़वा
बचपने की हरकतों में
जवानी का जोबन कहा गया || 3

बनाई थी बारिश में
जों कश्ती साथ की
वो कश्ती कहा गयी
वो सावन कहा गया ||

मेरी कलम से ......लक्की

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

एक चिठ्ठी अल्लाह के नाम


आँसुओ से हम अपनी इबादत लिख रहे है,
ऐ खुदा तुझ तक पहुचे तो ये चाहत लिख रहे है|
वो कितनी आसानी से नाकाबिल कह गए हमें
हम जों काबिलियत के वास्ते ये आयत लिख रहे है|| 1

यूँ मुहाजिर बन गए हम अपने ही महकमे में
दोस्तों को क्या कहे उन्हें शातिर लिख रहे है|
या मेरे मोला मिला दे अब उससे,
जिसको हम अपनी हिज्र के खतिर लिख रहे है || 2

ना मुरादी अब हमसे सही नहीं जाती
हम अपनी बर्दास्तागी की खातिर लिख रहे है|
नाकाफी है इस दुनिया में जानते है हम
बस दुनिया ये न जाने, की ये बाते लिख रहे है|| 3

तुम ने जैसा बनाया बन गए हम
इसलिए किस्मत को आजमाइश लिख रहे है|
थोड़ी समझदारी अब हमे भी अता कर
जों अपनी मासूमियत को रहनुमाइश लिख रहे है|| ४

....................लक्की
* इबादत = प्राथना,पूजा *एहले =खुद , स्वयं , * मुहाजिर = शरणार्थी
*महकमा =समूह,* हिज्र = जिद , *नामुरादी =असंतोष,किसी चीज़ का न होना ,
* आजमाइश =परखना ,* रहनुमाइश =आगे बदने वाली चीज़ ,लीडर ,|

शुक्रवार, 11 जून 2010

एक बार फिर


ठगा हुआ महसूस होता है, एक बार फिर
कर रहा है कोई मेरा ,इन्तजार
फिर
पता नहीं हमे यहाँ पर, किसकी तलाश
है
या फिर हमे तालाशरहा कोई , गुनाहगार फिर 1

हमने बड़ी ख़ुशी से उसे, फ़रिश्ता बना दिया
क्या पता छिपा लिबास में ,शैतान
फिर
मोका मिला था खुद को फिर ,जीने को जिन्दगी
लगता जीने में बाकी अभी है ,देर-दार फिर 2

अपनी हसरतो को हमने ,हँसकर मिटा दिया
उम्मीदों से बंधी है क्यू? ये पतवार फिर
कोशिश करो के निकले, सब गुबार दिल से
खुद को रखेगे तन्हाई में, एक बार फिर 3

कैफ, निदा और बद्र साहब के, नाम लिया करते है
उनसे बड़ा दीखता नहीं कोई, वफादार फिर
गजलो में अपनी छुपाते है , मासूमियत को
क्या पता सुनने वाला हो समझदार फिर4