शुक्रवार, 11 जून 2010

एक बार फिर


ठगा हुआ महसूस होता है, एक बार फिर
कर रहा है कोई मेरा ,इन्तजार
फिर
पता नहीं हमे यहाँ पर, किसकी तलाश
है
या फिर हमे तालाशरहा कोई , गुनाहगार फिर 1

हमने बड़ी ख़ुशी से उसे, फ़रिश्ता बना दिया
क्या पता छिपा लिबास में ,शैतान
फिर
मोका मिला था खुद को फिर ,जीने को जिन्दगी
लगता जीने में बाकी अभी है ,देर-दार फिर 2

अपनी हसरतो को हमने ,हँसकर मिटा दिया
उम्मीदों से बंधी है क्यू? ये पतवार फिर
कोशिश करो के निकले, सब गुबार दिल से
खुद को रखेगे तन्हाई में, एक बार फिर 3

कैफ, निदा और बद्र साहब के, नाम लिया करते है
उनसे बड़ा दीखता नहीं कोई, वफादार फिर
गजलो में अपनी छुपाते है , मासूमियत को
क्या पता सुनने वाला हो समझदार फिर4

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