
उडी पतंग आसमान में
उमंगो की डोर लिये|
लडती हवा से बलखाती हुई
हाथो का जोर लिये ||
कहना था उसे बहुत कुछ
शब्दों का न जोर था |
मन में कुछ विचार थे
हवा का भी शोर था ||
कभी दाये तो कभी बाये
हरतरफ उलझन थी जिसको |
कभी आगे तो कभी पीछे
बदने की होड़ थी उसको ||
लडती कभी हवा से कभी
कभी पेच लड़ाती थी |
पर जब भी देखो हरदम
आगे ही बढती जाती थी ||
निराला अंदाज था उसका
अटल विश्वास था उसका |
बिन कुछ बोले वो पतंग
सब कुछ ही कह गई ||
आगे ही बड़ने की राह
हम को वो दे गई |
कह गई पथ में हरदम
आगे ही बड़ते जाना है ||
मुश्किलों को झेल लेना
कभी न घबराना है |
यही जिन्दगी का अटल सत्य है
रुक जाना म्रत्यु का पथ है ||
ये कह कर पतंग ने
जीना हमको सिखा दिया |
जों इन्सान खुद ना कह सका
पतंग ने कर के दिखा दिया ||
इतना कह कर कट गई पतंग
आसमान के फलक से सट गई पतंग
आसमान के फलक से सट गई पतंग
आसमान के फलक से सट गई पतंग......... ||
.................... लक्की
