शनिवार, 15 मई 2010

सीख पतंग की


उडी पतंग आसमान में
उमंगो की डोर लिये|
लडती हवा से बलखाती हुई
हाथो का जोर लिये ||

कहना था उसे बहुत कुछ
शब्दों का जोर था |
मन में कुछ विचार थे
हवा का भी शोर था ||

कभी दाये तो कभी बाये
हरतरफ उलझन थी जिसको |
कभी आगे तो कभी पीछे
बदने की होड़ थी उसको ||

लडती कभी हवा से कभी
कभी पेच लड़ाती थी |
पर जब भी देखो हरदम
आगे ही बढती जाती थी ||

निराला अंदाज था उसका
अटल विश्वास था उसका |
बिन कुछ बोले वो पतंग
सब कुछ ही कह गई ||

आगे ही बड़ने की राह
हम को वो दे गई |
कह गई पथ में हरदम
आगे ही बड़ते जाना है ||

मुश्किलों को झेल लेना
कभी न घबराना है |
यही जिन्दगी का अटल सत्य है
रुक जाना म्रत्यु का पथ है ||

ये कह कर पतंग ने
जीना हमको सिखा दिया |
जों इन्सान खुद ना कह सका
पतंग ने कर के दिखा दिया ||

इतना कह कर कट गई पतंग
आसमान के फलक से सट गई पतंग
आसमान के फलक से सट गई पतंग
आसमान के फलक से सट गई पतंग......... ||
.................... लक्की

बुधवार, 5 मई 2010

मौजुदगी


गुजरे वक़्त की कशिश अब भी कही मौजूद है,
तनहा
जीने की वजह अब भी कही मौजूद है |

अकेलेपन की बेड़िया तोड़ने में रहे हम,
उन
बेडियो की दमक अब भी कही मौजूद है |

अपने मुकद्दर से करने चले थे बगावत,
उस
बगावत की ललक अब भी कही मौजूद है|

एक ही रास्ते पे खाई है ठोकरे बार बार,
उन
ठोकरों की जरुरत अब भी कही मौजूद है |

............................. लक्की