
गुजरे वक़्त की कशिश अब भी कही मौजूद है,
तनहा जीने की वजह अब भी कही मौजूद है |
अकेलेपन की बेड़िया तोड़ने में रहे हम,
उन बेडियो की दमक अब भी कही मौजूद है |
अपने मुकद्दर से करने चले थे बगावत,
उस बगावत की ललक अब भी कही मौजूद है|
एक ही रास्ते पे खाई है ठोकरे बार बार,
उन ठोकरों की जरुरत अब भी कही मौजूद है |
............................. लक्की
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