गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

बदलाव जरुरी है


सूखे फूलो की महक अब बड़ गई है ,
तेरी तस्वीर से मोहब्बत बड़ गई है |

ताकीर हिमाकत की रुपहले परदे में
आई थी जों उल्फत वो बड़ गई है |

जमीनों जद्द रहे हम जहाँ गुलशनो के मौसम में
उन राहो की शख्सियत बड़ गई है |

जिस्म- जहान के फेर में, मै उलझा ही नहीं था
तेरे जाने से पर ये तबियत बदल गई है |

हर चेहरे की संजीदगी अब मजाक लगती है मुझे
मासूमियत की भी तो सूरत ही मर गई है |
...............................लक्की

3 टिप्‍पणियां: