शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

एक चिठ्ठी अल्लाह के नाम


आँसुओ से हम अपनी इबादत लिख रहे है,
ऐ खुदा तुझ तक पहुचे तो ये चाहत लिख रहे है|
वो कितनी आसानी से नाकाबिल कह गए हमें
हम जों काबिलियत के वास्ते ये आयत लिख रहे है|| 1

यूँ मुहाजिर बन गए हम अपने ही महकमे में
दोस्तों को क्या कहे उन्हें शातिर लिख रहे है|
या मेरे मोला मिला दे अब उससे,
जिसको हम अपनी हिज्र के खतिर लिख रहे है || 2

ना मुरादी अब हमसे सही नहीं जाती
हम अपनी बर्दास्तागी की खातिर लिख रहे है|
नाकाफी है इस दुनिया में जानते है हम
बस दुनिया ये न जाने, की ये बाते लिख रहे है|| 3

तुम ने जैसा बनाया बन गए हम
इसलिए किस्मत को आजमाइश लिख रहे है|
थोड़ी समझदारी अब हमे भी अता कर
जों अपनी मासूमियत को रहनुमाइश लिख रहे है|| ४

....................लक्की
* इबादत = प्राथना,पूजा *एहले =खुद , स्वयं , * मुहाजिर = शरणार्थी
*महकमा =समूह,* हिज्र = जिद , *नामुरादी =असंतोष,किसी चीज़ का न होना ,
* आजमाइश =परखना ,* रहनुमाइश =आगे बदने वाली चीज़ ,लीडर ,|

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